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Chhattisgarh Ke Local Dhan: प्रमुख देसी धान की किस्में और खेती कैसे करें?



छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्थानीय (लोकल) धान: प्रकार, विशेषताएँ और खेती की पूरी जानकारी

छत्तीसगढ़ को भारत का 'धान का कटोरा' (Rice Bowl of India) कहा जाता है। यहाँ की मिट्टी और जलवायु धान की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल है। आधुनिक खेती के इस दौर में भी, छत्तीसगढ़ के किसान अपनी पारंपरिक और स्थानीय (Indigenous) धान की किस्मों को सहेज कर रखे हुए हैं। इन स्थानीय किस्मों की अपनी एक अलग पहचान, मनमोहक खुशबू और बेजोड़ स्वाद होता है।

इस विस्तृत लेख में हम छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकल धान के बारे में विस्तार से जानेंगे, जैसे कि कौन सा धान कब बोया जाता है, उसे पकने में कितना समय लगता है और इन पारंपरिक किस्मों की खेती कैसे की जाती है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्थानीय धान की विस्तृत जानकारी

1. जीराफूल (Jeeraphool)

  • विशेषता: जीराफूल छत्तीसगढ़ का सबसे प्रसिद्ध खुशबूदार धान है। इसके दाने जीरे की तरह बारीक और पतले होते हैं। पकने के बाद यह बहुत ही मुलायम और स्वादिष्ट होता है। इसकी इन्ही विशेषताओं के कारण इसे GI Tag भी मिल चुका है।
  • फसल की अवधि: यह एक मध्यम से लंबी अवधि वाली फसल है जिसे पकने में लगभग 135 से 140 दिन का समय लगता है।
  • बुवाई का समय: इसकी बुवाई आमतौर पर जून के मध्य से जुलाई के पहले सप्ताह (खरीफ मौसम) में की जाती है।
  • कटाई का समय: नवंबर के अंत से दिसंबर के मध्य तक।
  • पैदावार: लगभग 12 से 15 क्विंटल प्रति एकड़।

2. नगरी दुबराज (Nagri Dubraj)

  • विशेषता: सिहावा-नगरी क्षेत्र में पैदा होने वाले इस धान को "छत्तीसगढ़ का बासमती" कहा जाता है। यह मध्यम आकार का दाना होता है और इसकी महक दूर से ही पहचानी जा सकती है। इसे भी GI Tag प्राप्त है।
  • फसल की अवधि: इसे तैयार होने में 140 से 145 दिन लगते हैं।
  • बुवाई का समय: जून का दूसरा पखवाड़ा (मानसून की शुरुआत के साथ)।
  • कटाई का समय: दिसंबर का पहला सप्ताह।
  • पैदावार: 14 से 16 क्विंटल प्रति एकड़।

3. विष्णुभोग (Vishnubhog)

  • विशेषता: यह एक प्रीमियम किस्म है, जिसके चावल में प्राकृतिक रूप से हल्की मिठास और बेहतरीन खुशबू होती है। इसका उपयोग मुख्य रूप से खीर और खास पकवान बनाने में किया जाता है।
  • फसल की अवधि: विष्णुभोग धान को पकने में लगभग 135 से 140 दिन का समय लगता है।
  • बुवाई का समय: जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक।
  • कटाई का समय: नवंबर के अंतिम सप्ताह में।
  • पैदावार: 12 से 14 क्विंटल प्रति एकड़।

4. बादशाह भोग (Badshah Bhog)

  • विशेषता: यह बहुत ही छोटे और गोल दाने वाला खुशबूदार धान है। त्योहारों और विशेष आयोजनों में पुलाव या जीरा राइस बनाने के लिए इसकी काफी मांग रहती है।
  • फसल की अवधि: यह लगभग 130 से 135 दिन में पककर तैयार हो जाता है।
  • बुवाई का समय: जून-जुलाई।
  • कटाई का समय: नवंबर का मध्य।
  • पैदावार: 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़।

5. गठवान (Gathwan)

  • विशेषता: गठवान धान अपनी औषधीय (Medicinal) खूबियों के लिए जाना जाता है। पारंपरिक वैद्य और आदिवासी समुदाय इसका उपयोग गठिया (Arthritis) और जोड़ों के दर्द को दूर करने वाले आहार के रूप में करते हैं।
  • फसल की अवधि: यह जल्दी पकने वाली किस्म है, जो 115 से 120 दिन में तैयार हो जाती है।
  • बुवाई का समय: जून का मध्य।
  • कटाई का समय: अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में।
  • पैदावार: 10 से 13 क्विंटल प्रति एकड़।

6. लाईचा / लाल धान (Laicha / Red Rice)

  • विशेषता: इसका छिलका और चावल दोनों लाल रंग के होते हैं। इसमें आयरन, जिंक और एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा बहुत अधिक होती है। गर्भवती महिलाओं और कमजोरी दूर करने के लिए यह बहुत फायदेमंद माना जाता है।
  • फसल की अवधि: यह किस्म 120 से 125 दिन में पक जाती है।
  • बुवाई का समय: जून के मध्य से।
  • कटाई का समय: नवंबर की शुरुआत में।
  • पैदावार: 12 से 15 क्विंटल प्रति एकड़।

7. सफेद लुचई (Safed Luchai)

  • विशेषता: इसके दाने लंबे और पतले होते हैं। यह चावल पचने में बहुत हल्का होता है, इसलिए इसे दैनिक भोजन के लिए बहुत उत्तम माना जाता है।
  • फसल की अवधि: 130 से 135 दिन
  • बुवाई का समय: जून का अंतिम सप्ताह।
  • कटाई का समय: नवंबर का मध्य।
  • पैदावार: 15 से 18 क्विंटल प्रति एकड़।

धान की खेती की पूरी प्रक्रिया (Step-by-Step Cultivation Process)

छत्तीसगढ़ में पारंपरिक धान की खेती मुख्य रूप से खरीफ सीजन (मानसून) में की जाती है। इन देसी किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें बहुत अधिक रासायनिक खादों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि ये जैविक (Organic) तरीके से बेहतरीन उत्पादन देती हैं। धान की खेती के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:

1. खेत की तैयारी (Land Preparation)

धान की खेती के लिए चिकनी या दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है जिसमें पानी रोकने की क्षमता हो।

  • जुताई: मानसून आने से पहले खेत की गहरी जुताई (Summer ploughing) की जाती है ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और कीड़े-मकोड़े नष्ट हो जाएं।
  • पडलिंग (मचाई / कीचड़ करना): रोपाई से पहले खेत में पानी भरकर कल्टीवेटर या रोटावेटर से मचाई की जाती है। इससे खेत में पानी रुकने लगता है और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

2. बीज उपचार (Seed Treatment)

स्वस्थ फसल के लिए बीज उपचार बहुत जरूरी है। देसी किस्मों के बीजों को बुवाई से पहले फफूंदनाशक या जैविक तरीके से ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) और स्यूडोमोनास से उपचारित किया जाता है ताकि बीज जनित रोग न लगें।

3. नर्सरी तैयार करना (Nursery Preparation)

धान सीधे बोने (Broadcasting) के बजाय रोपाई (Transplanting) विधि से अधिक पैदावार देता है।

  • जून के पहले या दूसरे सप्ताह में खेत के एक छोटे हिस्से में नर्सरी (थरहा) डाली जाती है।
  • एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए लगभग 12 से 15 किलो उन्नत बीज की नर्सरी पर्याप्त होती है।
  • नर्सरी में 21 से 25 दिन में पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।

4. रोपाई (Transplanting)

जब नर्सरी के पौधे 3-4 पत्तियों वाले हो जाएं (लगभग 21-25 दिन के), तब उन्हें मुख्य खेत में रोपा जाता है।

  • रोपाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 20 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी रखनी चाहिए।
  • एक जगह पर 2 से 3 पौधे लगाने चाहिए। पौधे को ज्यादा गहराई में न लगाएं।

5. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)

चूँकि ये पारंपरिक किस्में हैं, इसलिए रासायनिक खादों (Urea, DAP) का प्रयोग कम से कम करना चाहिए।

  • खेत की तैयारी के समय 3 से 4 टन सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) या केंचुआ खाद (Vermicompost) प्रति एकड़ डालना सबसे उत्तम है।
  • यदि रसायनिक खाद डालनी हो, तो मृदा परीक्षण के आधार पर ही संतुलित मात्रा का उपयोग करें।

6. सिंचाई और जल प्रबंधन (Water Management)

धान एक पानी चाहने वाली फसल है, लेकिन खेत में हमेशा बहुत अधिक पानी भर कर रखना जरूरी नहीं है।

  • रोपाई के बाद 1 सप्ताह तक खेत में 2-3 सेमी पानी बनाए रखें ताकि जड़ें सेट हो जाएं।
  • कल्ले निकलते समय (Tillering) और बालियाँ बनते समय (Panicle initiation) खेत में नमी या हल्का पानी होना अति आवश्यक है।
  • कटाई से 10-15 दिन पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए।

7. खरपतवार नियंत्रण (Weed Control)

खरपतवार फसल का पोषण छीन लेते हैं।

  • रोपाई के 20 और 40 दिन बाद निराई-गुड़ाई (हाथों से या कोनोवीडर मशीन से) करनी चाहिए।
  • यह मिट्टी में हवा का संचार बढ़ाता है और जड़ों के विकास में मदद करता है।

8. रोग एवं कीट नियंत्रण (Pest and Disease Management)

स्थानीय किस्मों में बीमारियों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता (Immunity) अधिक होती है। फिर भी तना छेदक (Stem borer) या पत्ती लपेटक (Leaf folder) का प्रकोप दिखने पर नीम के तेल (Neem Oil) का छिड़काव या जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।

9. कटाई और गहाई (Harvesting and Threshing)

जब धान की बालियां 80% सुनहरी हो जाएं और दानों में नमी 20% तक रह जाए, तब कटाई कर लेनी चाहिए।

  • कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में सुखाया जाता है।
  • इसके बाद थ्रेशर मशीन या पारंपरिक तरीके से गहाई (Threshing) करके धान को अलग कर लिया जाता है।
  • भंडारण से पहले धान को अच्छी तरह धूप में सुखाना चाहिए ताकि नमी 10-12% तक आ जाए, जिससे अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रहे।

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ के इन पारंपरिक धानों की खेती केवल एक कृषि कार्य नहीं है, बल्कि यह यहाँ की संस्कृति और विरासत का हिस्सा है। आधुनिक समय में जब लोग जैविक (Organic) और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की ओर लौट रहे हैं, तो इन स्थानीय धानों का महत्व और भी बढ़ गया है।

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